मंथन: भूमिका

“मंथन” मोहनदास गाँधी (महात्मा) व रबिंद्रनाथ ठाकुर (गुरुदेव) के मध्य हुए पत्राचार एवं उनके द्वारा लिखे गए कुछ निबंधों का हिंदी अनुवाद है।

इन पत्रों व निबंधों को वेबसाइट mkgandhi.org व सब्यसाची भट्टाचार्य की पुस्तक “The Mahatma and The Poet” से लिया गया हैं। भट्टाचार्यजी ने इन पत्रों का संकलन करने के साथ महात्मा और गुरुदेव के वार्तालाप को उनके समुचित ऐतिहासिक संदर्भ में भी प्रस्तुत किया है। पाठकों से निवेदन है कि उनकी किताब ख़रीदें और पढ़ने के बाद निकटतम पुस्तकालय अथवा शासकीय विद्यालय को दान करें।

महात्मा और गुरुदेव का संवाद १९१४ में शुरू हुआ था। उन दिनों गाँधी अपने दक्षिण अफ्रीकी शिष्यों के साथ शांतिनिकेतन के दौरे पर थे। उसके एक वर्ष पूर्व ५२ वर्ष की अवस्था में रबिंद्र एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता बने थे। गाँधी तब भारतीय राजनीति में सक्रिय नहीं थे, हालाँकि उनके दक्षिण अफ्रीकी सत्याग्रह भारत में काफ़ी चर्चित थे। समय के साथ दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ती रही और उनका पत्राचार १९४१ में ठाकुरजी के देहांत तक निरंतर बना रहा। गाँधी को महात्मा की उपाधि नवाज़ने वाले रबिंद्र थे, और रबिंद्रनाथ ठाकुर को “गुरुदेव” पहली बार महात्मा गाँधी ने ही कहा था।

यद्यपि दोनों का शिक्षण आंग्ल परिपाटी में हुआ था परंतु मूलभूत दार्शनिक विषयों पर गाँधी और रबिंद्र के विचार काफ़ी अलग थे। इसके कारण राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिंक मुद्धों पर दोनों के बीच काफ़ी मतभेद थे। जैसे शिक्षण संस्थानों को बहिष्कृत करने का प्रभाव, हस्तशिल्प उद्योगों की सम्भावनाएँ व सीमाएँ, चरखा, वैज्ञानिक सोच बनाम धार्मिकता आदि। पत्रों के माध्यम से वह अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते और दूसरे का मन बदलने का प्रयत्न करते थे।

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